हम औरतें
हम औरतें
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हम औरतें
कुम्हार की माटी की तरह
मूर्ति बनने से पूर्व
कूटी और पीटी जाती है
फिर जिस सांचे की
मूर्ति बनानी हो
उस सांचे में गढ़ दी जाती है
हर रोज.....
चूक से भी मूर्ति में
यदि कोई हो जाती है चूक
अस्वीकार और निर्रथक हो जाती है हम
तब दोबारा तोड़ दी जाती है
नये सांचे में नई मूर्ति के लिए
हर रोज.....
गोल गोल पकी हुई
रोटी सी हर रोज
गरम गरम तवे पर सींकती है हम
कच्चापन दिखाई देने मात्र से
आग की लपटों में फिर से
सेंकी जाती है हम
हर रोज......
पके हुए व्यंजनों में
नमक सी घुल जाती है हम
हर रोज
फीके बेस्वाद खाने में
ज़ायका बढ़ा देती है हम
हर रोज...
यदि चूक से
बढ़ जाय नमक
चढ़ जाती है त्यौरियां
फेंकी जाती है थालियां
तब थाली सी ठनठनाती है हम
हर रोज......
हम औरतें
न जाने कब तक
कूटी और पीटी जाएंगी
कुम्हार की माटी की तरह
आग में सैकेंगी और
पकाई जाएंगी रोटियों की तरह
परोसी जाएंगी भोजन की तरह
फ़ैकि जाएंगी थलियों की तरह
हर रोज ....
हम कब तोड़ेंगी अपना सब्र
उफनती नदिया की तरह
जब तटबंधों को तोड़
फैल जाएंगी हम
अंतहीन रास्तों पर
बहा ले जाएगी
अपने साथ कलुषित समाज की
रूढ़िवादी उहापोह को
हम औरतें ....
पुष्पा
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