मछली
मछली
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ज्वार-भाटा चढ़ता है
लहरों पर लहरों
ऊँची ऊँची उछालों से
दूर जा गिरती है |
रेतली बालू मिट्टी पर
मछली |
ज्वार-भाटा का
थम जाना
लहरों का
लौट जाना
छोड़ जाता है
तलछ्टों पर
छटपटाती
तडफ तडफ कर
जान देती है
मछली |
पुष्पा
कभी बचपन में ऊँचे सपनों का दौर और उमींदो का छोर पकड़े हवों में उड़ते ना जाने कहाँ पहुँचने का इरादा होता था ठीक से नहीं पता किन्तु जब सब रेत की तरह हाथ से सपने फिसलते थे तो उस तड़फ को महसूस किया है |यह कविता उसी बचपन की यादों में ले गयी, हालाकि कविता आज भी सार्थक ही लगती है ।
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