लेख - जहर उगते शहर, मौत के साए में इंसान


जहर उगते शहर, मौत के साए में इंसान
भाग -1

भारत में पयार्वरण की स्थिति दिन प्रति दिन भयानक होती जा रही है | भारत के शहरों के हालत विषैले होते जा रहे है अगर महानगरों की बात करें तो ये दिन दूना रात चौगुना जहर उगल रहे है | शहरों में टी.वी., केंसर, पीलिया, फेफड़ो का कमजोर होना आदि मरीजों की संख्या बढ़ रही है | अस्पताल भरे पड़े है आज स्थिति यह है कि कई मरीजों को अस्पताल में इलाज के लिए जगह ही नहीं है | आये दिन कई मरीजों को अस्पताल के प्रांगण में ही तिल-तिल मरते देखा जा सकता है | आखिर यहं का पर्यावरण इतना दूषित कैसे हो गया | यह केवल जनसंख्या में बढ़ोतरी का कारण तो नहीं हो सकता, फिर ऐसा क्या है ? जिसकी वजह से शहरों ने जहर उगना शुरू कर दिया |

बड़े बड़े शोध रिपोर्ट आ रही है, लोग संवाद कर रहे है, और नतीजा शहरों में पानी प्रदूषित हो गया है, वायु प्रदूषित है, शहर कचरें के ढेर पर साँस ले रहा है, यहाँ तक कहा जाता है भारत में शौच खुले में किया जाता है इसलिए भी पर्यावरण दूषित है | वाकई यही कारण है क्या ? या फिर कुछ और कारण है जिन पर हम बात नहीं करना चाहते है ?

खुले में शौच

इंसानी सभ्यता के जन्म के समय भी यही धरा थी और आज भी यही है, लोग उस समय भी शौच खुले में जाते होंगे इन्हीं जल स्रोतों से जल लेते होंगे, इसी पर्यावरण में सांस लेते होंगे तब यह समस्या नहीं थी क्योंकि मुझे लगता है जो कुदरती क्रिया है उससे कभी पर्यावरण को कोई नुक्सान नहीं हो सकता | यह एक प्रकृति का पूरा च्रक है जिसे कुदरत स्वीकार कर लेती है अर्थात् कुदरत कुदरती प्रक्रिया का उपभोग (Recycle) कर उसे सामान्य बना देती है | आज स्वच्छता अभियान पूरे देश में चल रहा है | “जहाँ शौचालय वहाँ सोच” की बात हो रही है फिर भी पर्यावरण जीने लायक क्यों नहीं है | शहरों में तो शायद ही कोई खुले में शौच जाता हो यदि जाते भी होंगे तो उसका प्रतिशत बहुत कम होगा | वैसी भी शहरों में जगह नहीं होने की बात को कहा जा रहा है तो खुले में शौच कैसे हो सकता है | वैसे भी सभ्यता का तमगा लटकते हुए लोग ऐसा नहीं करेंगे | फिर भी पयार्वरण जान लेवा हो गया है |

जहरीली वायु व जल

शहरों की आबोहवा बेहद खतरनाक हो गयी है | अब तो लोग मास्क लगाकर अपनी साँसे सुरक्षित करने की कोशिश करते है | वायु पूरी तरह से प्रदूषित हो गयी है | यहाँ पर बेलगाम दौड़ते वाहन, नये वाहनों की होड़, किलोमीटरों में फैला लैंडफिल अपनी दुर्गन्ध से पूरा वातारण को जहरीला बना रहा है | यही नहीं यही लैंडफिल में बरसाती पानी को सोख के अपने मे समाहित करता है । इसके बाद इस रुके हुए पानी खतरनाक रसायनों के साथ भू-जल में मिलता है अर्थात् यह वायु और जल दोनों दूषित करता है | अब नतीजे सामने आने लगे है लोग इनके चपेट में आने लगे है | बड़ी बड़ी बिमारियों को पनप रही है |

ये सब क्यों हो रहा है

उक्त कारणों को सभी जानते है किन्तु हमारी सरकारें नहीं जानती, क्योंकि यह मुद्दा कभी किसी सरकार के घोषणा पत्र का हिस्सा नही बन पाता है | सबको अपनी कुर्सी को बचना है, यदि यह मुद्दा बन जाए तो सरकार कितने दिन चलेगी इसकी गारंटी नहीं है | यही कारण है सब खामोश है |

आये दिन नई-नई कार व बाइक के मॉडल सड़कों में उतारे जा रहे है खरीददारों को संख्या भी कम नहीं है | सड़को पर गाड़ियों का सैलाब दिखाई देता है | पैदल या साइकिल चलाने वाले के लिए कोई रास्ता ही नहीं बनाया गया है | यही तो इक्कीसवीं सदी का भारत है | पब्लिक ट्रांसपोर्ट को कम का दिया गया है और व्यक्तिगत वाहनों की भरमार दिखाई देती है, इन पर कोई रोक नहीं है क्योंकि हमारी सरकारें भी इन्ही बड़ी बड़ी कम्पनियों के द्वारा चलाई जाती है । ये निजी वाहन पूरे शहर की हवा को वाहनों से निकले प्रदूषण से विषैला बना रहे है किन्तु वाहनों को नियंत्रण करना सरकार के कार्य क्षेत्र से बाहर का काम लगता है । इस पर न बहस होती है न ही कोई कानून बनता है ।

एक ओर शोर है खुले में शौच से तो पर्यावरण प्रदूषित होता है | दूसरी ओर पूरे शहर का कुड़े व गन्दगी का आलम यह है कि गन्दगी पूरा पहाड़ का रूप ले चुकी है और जहरीली वायु दे रहे है और जल दूषित कर रहे है तो भी कोई बात नहीं | सरकार खामोश है । 

यदि शहर में कार चालक के लिए रास्ता न हो तो नये पुल, फ्लाईओवर द्वारा इस दिक्कत को सहज ही हल कर दिया जाता है भले ही साइकिल सवार व पैदल यात्री के लिए कोई रास्ता न हो, तो भी क्या फर्क पढ़ता है | पराली का धुआं बड़ा मुद्दा है पर गाड़ियों का धुआं कोई मुद्दा नहीं आखिर कब थमेगा ?  
क्रमशः...

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 दिल्ली में गरीबी रेखा के नीचे जीने वालों का जीवन इसी तरह कूड़े के ढेर के आस पास चलता है 

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